सरकारी बैंकों (PSU Banks) के बारे में सरकार की सोच बदल गई है। सरकार इन बैंकों में अपनी पूरी हिस्सेदारी खत्म करना चाहती है। इसके लिए उसे कानून में संसोधन करना होगा। अभी जो कानून है उसके मुताबिक सरकारी बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम नहीं हो सकती। अंग्रेजी बिजनेस न्यूज वेबसाइट इकोनॉनिक टाइम्स ने यह खबर दी है।

सरकार संसद के मानसून सत्र में बिल पेश कर सकती है। इसके पारित होने के बाद सरकारी बैंकों में अपनी पूरी हिस्सेदारी खत्म करने का रास्ता सरकार के लिए खुल जाएगा। अभी बैंकिंग कंपनीज (एक्विजिशन एंड ट्रांसफर ऑफ अंडरटेकिंग्स) एक्ट, 1970 लागू है। इसके मुताबिक, किसी सरकारी बैंक में सरकार की हिस्सेदारी कम से कम 51 फीसदी होनी चाहिए। इसका मतलब है कि बैंक का नियंत्रण सरकार के पास होना अनिवार्य है।

सरकार पहले ही सरकारी बैंकों के धीरे-धीरे निजीकरण का फैसला ले चुकी है। लेकिन, उसका मानना था कि वह इन बैंकों में अपनी हिस्सेदारी कम से कम 26 फीसदी बनाए रखेगी। अभी सेबी के नियमों के मुताबिक, किसी प्राइवेट बैंक में प्रमोटर की अधिकतम हिस्सेदारी 26 फीसदी हो सकती है।

सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में ही बैंकिंग लॉज अमेंडमेंट बिल, 2021 पेश करना चाहती थी। लेकिन किसी वजह से यह बिल पेश नहीं हो सका। इस साल फरवरी में पेश बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार दो सरकारी बैंकों और एक जनरल इंश्योरेंस कंपनी का प्राइवेटाइजेशन करेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि इसके लिए कानून में संशोधन किया जाएगा।

सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक के निजीकरण का फैसला लिया है। लेकिन, अभी इसका औपचारिक ऐलान नहीं किया गया है। IDBI Bank के निजीकरण का प्रोसेस पहले से चल रहा है। इस बैंक का गठन कंपनीज एक्ट, 1956 के तहत हुआ है। इसलिए इसके निजीकरण के लिए कानून में संशोधन की जरूरत नहीं है।

सरकार छोटे सरकारी बैंकों का विलय कर बड़ा बैंक बनाने की भी कोशिश कर रही है। इसके तहत कई सरकारी बैंकों का विलय बड़े सरकारी बैंकों में किया जा चुका है। इससे सरकारी बैंकों की कुल संख्या में भी कमी आएगी। सिंडिकेट बैंक का केनरा बैंक में विलय इसका उदाहरण है। इसी तरह कई छोटे सरकारी बैंकों का विलय बड़े सरकारी बैंक में किया गया है।

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