DELHI:- इस बार मॉनसून का मजा इंडिया गेट पर नहीं ले पाएंगे, वे दिन तो आपको याद ही होंगे, जब राजधानी के तमाम परिवार शनिवार की शाम को जल्दी खाना बनाकर और घर की एक चादर लेकर इंडिया गेट पहुंच जाते थे। मॉनसून के मौसम में तो कपल्स, दोस्तों के ग्रुप्स और तमाम परिवार दिन में भी इंडिया गेट मौसम का मजा लेने पहुंच जाया करते थे। शायद ही कोई दिल्ली वाला हो जो परिवार या दोस्तों के साथ इंडिया गेट एंजॉय करने ना पहुंचा हो। तब केंद्रीय सचिवालय से लेकर इंडिया गेट तक रौनक ही रौनक दिखती थी। जगह- जगह भुनते भुट्टे की खुशबू, गोलगप्पे का मजा, बच्चों की सवारी, आइसक्रीम, भेलपुरी, बोटिंग और फैमिली के साथ ढेर सारा एंजॉयमेंट वीकेंड को यादगार बना देता था। और ये सब होता था बहुत कम खर्च में। इसलिए कई बार लाखों लोग वीकेंड पर इंडिया गेट पहुंच जाया करते थे। फिर दो साल कोरोना रहा और दिल्ली वाले मॉनसून में भी कम ही घर से निकले। लेकिन अब जब प्री-मॉनसून ने दिल्ली में बौछार कर दी है और माहौल भी सामान्य है, तो राजधानी में रहने वालों के सामने एक समस्या ये है कि आखिर इस बार मॉनसून एंजॉय करने कहां जाएं, क्योंकि फिलहाल इंडिया गेट पर आम नागरिकों का जाना मना है।

​कहां मिलेगी इतनी किफायती जगह?

कहने को तो दिल्ली में तमाम जगहें हैं जहां घूमने जा सकते हैं, लेकिन दिल्ली वालों के लिए इंडिया गेट किफायत की वजह से भी खास था। मुकुल कहते हैं, ‘दिल्ली में इंडिया गेट जैसी कोई जगह नहीं हो सकती क्योंकि वह किफायती बहुत थी। बस मेट्रो लो और पहुंच जाओ पूरे परिवार के साथ। 150 की सबने आइसक्रीम खा ली, 50-100 रुपये के गोलगप्पे हो गए, 100 के भुट्टे मान लो और इतना ही बच्चों का खिलौना समझ लो। कुल मिलाकर 500-700 रुपये में आप चार से पांच घंटे खूब मजे करते थे वो भी बिना किसी टेंशन के। अभी मॉनसून एंजॉय करने के लिए कनॉट प्लेस जाइए, तो एक रेस्टोरेंट में दो लोगों का ही बिल हजार रुपये तक चला जाता है। फिर फैमिली का बिल तो तीन से चार हजार तक जाता है। दूसरी जो घूमने की जगहें हैं वहां पर इतनी रौनक नहीं होती कि अहसास हो। कई जगहें तो रात को बंद कर दी जाती हैं। इसलिए उतने कम खर्च में वैसा मजा तो कहीं नहीं मिल सकता।’ खानपुर से अपने बच्चों को इंडिया गेट घुमाने लाए विवेक कहते हैं, ‘मेरी बेटी पहली बार आई है, जबकि मैं तो अपने बचपन में कई बार आ चुका हूं। यहां इसलिए ही ज्यादा आया जाता था कि कोई खर्च तो है नहीं और फोटोग्राफी अच्छी हो जाती थी। दुनिया जानती है कि इंडिया गेट दिल्ली में है, तो ये ही अपने आप में पहचान होती थी।’

इंडिया गेट पर सामान बेचने वाले पुराने विक्रेता भी पुराने दिनों को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। यहां सबसे पुराने विक्रेताओं में से एक विजय कुमार जैन कहते हैं, ‘हम यहां तब से हैं जब केवल इंडिया गेट था और बाकी आसपास का इलाका इतना बसा हुआ नहीं था। मॉनसून के दिनों में यहां खूब पब्लिक एंजॉय करने आती थी। उस दौरान बारिश होती थी, तो कुछ लोग भीगते थे और कुछ लोग इंडिया गेट के अंदर जाकर खुद को बचाते थे। वो नजारा खूब अच्छा होता था कि चारों तरफ हरियाली के बीच नौजवान खुशी से झूम रहे हैं और भीग रहे हैं। अब तो अगर बारिश हो जाए, तो कोई कहां पर खुद को बचाएगा। अब बोटिंग भी नहीं हो रही और ना बैठने-खाने पीने की जगह है। इसलिए ना पिछले साल रौनक रही और ना इस साल रौनक दिख रही है, जबकि इस साल तो सब ठीक है।’ हालांकि इस वजह से इन विक्रेताओं के काम पर खूब असर पड़ा है और कई विक्रेता वॉर मेमोरियल की ओर शिफ्ट हो गए हैं।

ना टिकट था, ना कोई चारदीवारी

एक अन्य विक्रेता किशन गोपाल कहते हैं, ‘पहले इंडिया गेट पर लगभग 3000 विक्रेता होते थे। तब ना कोई टिकट था और ना कोई चारदीवारी थी तो लोग अपनी गाड़ी से आते थे, उसे पार्किंग में लगाकर परिवार के साथ एंजॉय करते थे। मगर अब तो पार्किंग की भी जगह नहीं है, इसलिए कई लोग तो आना अवॉइड करते हैं।’ क्या अब इन विक्रेताओं को उम्मीद है कि 2019 वाली वो रौनक फिर से लौट पाएगी? इसका जवाब ज्यादातर विक्रेता संशय में देते हैं। एक विक्रेता देवेंदर सिंह कहते हैं, ‘ऐसा लगता तो नहीं कि अब उतने लोग आया करेंगे, क्योंकि अब पार्किंग भी नहीं है। मेट्रो काफी दूर है तो कोई अपने परिवार को इतना नहीं चलवाना चाहता। लेकिन फिर भी अगर वो रौनक लौट आए तो अच्छा है।’

इंडिया गेट आने वाले हो रहे हैं निराश

फिलहाल जो लोग इंडिया गेट घूमने आ रहे हैं, उन्हें दूर से फोटो लेकर और वॉर मेमोरियल घूमकर ही काम चलाना पड़ रहा है। दूर से इंडिया गेट को फ्रेम में लेकर फोटो खींचने की कोशिश कर रहे राज गुप्ता पटना से इंडिया गेट घूमने आए थे। अपनी निराशा जाहिर करते हुए वह कहते हैं, ‘हम पहली बार दिल्ली आए हैं। सोचा था कि इंडिया गेट पर फोटो खिंचवाएंगे मस्ती करते हुए। लेकिन दूर से ही देखना पड़ रहा है। ये तो किताबों में देखने जैसा ही हो गया ना।’ वहीं महाराष्ट्र से आए पांडुरंग कठारे कहते हैं, ‘वॉर मेमोरियल अच्छा बनाया है, लेकिन जो नाम इंडिया गेट का है वो अभी किसी और का नहीं है। इसलिए उसके करीब तक ना जा पाना थोड़ा निराश करता है।’

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